दान-पुण्य का पर्व मकर सक्रांति
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| पं. मुकुन्द देव शुक्ला |
इलाहाबाद ज्योतिषाचार्य पं. मुकुन्द देव शुक्ला के अनुसार सम्पूर्ण भारत वर्ष में मकर सक्रांति का पर्व आदिकाल से ही सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों व वेदों में सूर्य को आत्मा माना गया है। निर्णय सिंधु के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा जब एक ही साथ माघ मास में मकर राशि पर आते हैं, तो उसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। मकर सक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। पं. मुकुन्द देव शुक्ला अनुसार सूर्योपासना का पर्व मकर सक्रांति इस बार 15 जनवरी को सम्पूर्ण देश भर में धूमधाम से मनाया जाएगा। इसी वर्ष सूर्य का दक्षिणायान से उत्तरायण मकर राशि में प्रवेश सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर मकर सक्रांति से सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलते हैं। सूर्य भूमध्य रोखा को पार कर उत्तर की ओर मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ना प्रारंभ कर देते हैं। इसी को सूर्य का उत्तरायण संक्रमण कहते हैं। उत्तरायण के 6 माह में सूर्य क्रमश: मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ, मिथुन इन 6 राशियों में भ्रमण करता है। प्राणी मात्र व वनस्पति को जीवन शक्ति सूर्य से ही प्राप्त होती है। सूर्य को प्रत्यक्ष भगवान माना गया है। ज्योतिष के मुताबिक एक सूर्य बारह माह में बारह नाम से जाना जाता है। बारह रूप धारण कर एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। मकर सक्रांति से दिन बड़े होने शुरू होते हैं।माना जाता है की मकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर सक्रांति का ही चयन किया था | मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरत के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी |
शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है |धरना है की इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है | इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है |
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