Thursday, 26 January 2012

कुज दोष (मंगली दोष)


इलाहाबाद ज्योतिषाचार्य पं. मुकुन्द देव शुक्ला मंगली दोष का नाम सुनते ही वर और कन्या के अभिभावक सतर्क हो जाते है, मंगलिक शब्द एक प्रकार से भय अथा अमंगल का सूचक बन गया है,परन्तु प्रत्येक मंगली जातक विवाह के अयोग्य नही होता है,सामान्यत: मंगलीक दिखाई पडने वाली जन्म पत्रियां भी ग्रहों की स्थिति तथा द्रिष्टि के कारण दोष रहित हो जाती है,यहां विवाह सम्बन्धो के लिये मंगली दोष विषयक आवश्यक वैदिक जानकारियां प्रस्तुत की जा रही है.

वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है

सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है. जन्म कुन्डली का सातंवा भाव विवाह पत्नी ससुराल प्रेम भागीदारी और गुप्त व्यापार के लिये माना जाता है। सातवां भाव अगर पापग्रहों द्वारा देखा जाता है,उसमें अशुभ राशि या योग होता है,तो स्त्री का पति चरित्रहीन होता है,स्त्री जातक की कुंडली के सातवें भाव में पापग्रह विराजमान है,और कोई शुभ ग्रह उसे नही देख रहा है,तो ऐसी स्त्री पति की मृत्यु का कारण बनती है,परंतु ऐसी कुंडली के द्वितीय भाव में शुभ बैठे हों तो पहले स्त्री की मौत होती है,सूर्य और चन्द्रमा की आपस की द्रिष्टि अगर शुभ होती है तो पति पत्नी की आपस की सामजस्य अच्छी बनती है,और अगर सूर्य चन्द्रमा की आपस की १५० डिग्री,१८० डिग्री या ७२ डिग्री के आसपास की युति होती है तो कभी भी किसी भी समय तलाक या अलगाव हो सकता है।केतु इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.सप्तम भाव पर यदि मंगल की नजर हो तो ये शुभ नहीं होती। मकर या स्वराशि के मंगल के फल अधिक तीव्र मिलते हैं। लग्न के मंगल की दृष्टि पति या पत्नी को अभिमानी बनती है और विवाह सुख में कमी कराती है। दोनों ही गुस्से के तेज होते हैं अतः मतभेद बने ही रहते हैं। चतुर्थ भाव के मंगल की दृष्टि भी अशुभ फल देती है। साथी को उदर रोग होते है। सप्तम भाव विवाह और गृहस्थी के सुख की दृष्टि से बड़ा ही महत्वपूर्ण भाव है। जितना महत्व इसमें उपस्थित राशि और इसमें बैठे ग्रह का है, उतना ही महत्व इस पर दृष्टि रखने वाले ग्रहों के प्रभाव का भी होता यदि जातक की जन्म कुण्डली में लग्न यानी प्रथम भाव बारहवें भाव,पाताल चतुर्थ भाव,जामित्र यानी सप्तम भाव, तथा अष्टम में मंगल बैठा हो,तो कन्या अपने पति के लिये तथा पति कन्या के लिये घातक होता है,इसे मंगली दोष कहते है,यदि वर की कुन्डली में धन यानी दूसरे सुत यानी पंचम, सप्तम यानी पत्नी भाव,अष्टम यानी मृत्यु भाव और व्यय यानी बारहवें भाव में मंगल विराजमान हो तो वह उसकी स्त्री का विनाश करता है,और यदि स्त्री की कुन्डली में इन्ही स्थानों में मंगल विराजमान हो तो वह विधवा योग का कारक होता है,मंगल की इस प्रकार की स्थिति के कारण वर और कन्या का विवाह वर्जित है,आचार्यों ने एकादस भाव स्थित मंगल को भी मंगली की उपाधि दी है कुल मिलाकर मंगल की इन स्थितियों में कुण्डली मांगलिक ही कही जाती है वैवाहिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है,केवल गुण मिला देने से या मंगलीक वाली बातों को बताने से इन बातों का फ़ल सही नही मिलता है,इसके लिये कुंडली के सातंवे भाव का योगायोग देखना भी जरूरी होता है। अतः विवाह करते समय इस मंगल को मिला कर ही विवाह करना अच्छा रहता है अन्यथा विवाह सुख नहीं मिलना तय होता है।अतः सावधानीपूर्वक कुंडली मिलान करके ही विवाह करना चाहिए।                                                                                                                                                                  

Tuesday, 24 January 2012

हनुमानचालीसा का पाठ है चमत्कारिक :

                                    पं. मुकुन्द देव शुक्ला


इलाहाबाद। 24/1/2012 ज्योतिषाचार्य पं. मुकुन्द देव शुक्ला के अनुसार हनुमानजी को मनाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ। यदि आप मानसिक अशांति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्यां सता रही है तो ऐसे में सभी ज्ञानी विद्वानों द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ की सलाह दी जाती है। इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें को शंका या संदेह नहीं है। यह बात लोगों ने साक्षात् अनुभव की होगी की हनुमान हनुमानजी की यह स्तुति का सबसे सरल और सुरीली है। इसके पाठ से भक्त को असीम आनंद की प्राप्ति होती है। तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा बहुत प्रभावकारी है। इसकी सभी चौपाइयां मंत्र ही हैं। जिनके निरंतर जप से ये सिद्ध हो जाती है और पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है।  यदि घर में प्रतिदिन घर में क्लेश की स्थिति बनी रहती है तो भी इसका समाधान श्री हनुमान जी के पास है. नित्य प्रातःकाल सूर्योदय के समय पति या पत्नी एक ताम्बे के लोटे में थोडा सा गुड़ और एक छोटी इलायची डाल कर सूर्य देव के सामने बैठ कर श्री हनुमान चालीसा के दो पाठ कर सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान कर दें. कुछ ही दिनों में पति व पत्नी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के मध्य सद्भावनापूर्ण व्यवहार होनेलगेगा.विद्यार्थियों को परीक्षा का टेंशन है... किसी को भूत-पिशाचों का भय सता रहा है... मानसिक शांति नहीं मिलती... स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं पीछा नहीं छोड़ती... ऐसी ही मानव जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का हल है रामभक्त श्री हनुमान के पास। परंतु आज के दौर में जब हमारे समयाभाव है और इसी के चलते हम मंदिर नहीं जा पाते, विधि-विधान से पूजा-अर्चना नहीं कर पाते हैं। ऐसे में भगवान की कृपा कैसे प्राप्त हो? क्या किया जा जिससे कम समय में ही हमारे सारे दुख-कलेश, परेशानियां दूर हो जाए?
अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता श्री हनुमान जी... जिनके हृदय में साक्षात् श्रीराम और सीता विराजमान हैं... जिनकी भक्ति से भूत-पिशाच निकट नहीं आते... हमारे सारे कष्टों और दुखों को वे क्षणांश में ही हर लेते हैं। ऐसे भक्तवत्सल श्री हनुमान जी की स्मरण हम सभी को करना चाहिए।तो आपकी सभी समस्या का सबसे सरल और कारगर उपाय है. श्री हनुमानचालीसा का जाप। कुछ ही मिनिट की यह साधना आपकी सारी मनोवांछित इच्छाओं को पूरा करने वाली है। श्री हनुमान चालिसा का जाप कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है। गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा अत्यंत ही सरल और सहज ही समझ में आने वाला स्तुति गान है। श्री हनुमान चालीसा में हनुमान के चरित्र की बहुत ही विचित्र और अद्भुत व्याख्या की गई हैं। साथ ही इसके जाप से श्रीराम का भी गुणगान हो जाता है। श्री हनुमानजी बहुत ही कम समय की भक्ति में प्रसन्न होने वाले देवता है। श्री हनुमान चालीसा की एक-एक पंक्ति भक्ति रस से सराबोर है जो आपको श्री हनुमान जी के उतने ही करीब पहुंचा देगी जितना आप उसका जाप करेंग। कुछ समय में इसके चमत्कारिक परिणाम आप सहज ही महसूस कर सकेंगे।प्रत्येक मंगलवार तथा शनिवार सांयकाल श्री हनुमान चालीसा के पांच पाठ सामने गुग्गल का धूप जला कर करे तो घर की सन्तान नियंत्रित होती है. ध्यान रखें कि बैठने का आसन और सिर पर लाल रंग का शुद्ध वस्त्र रख कर करे. तथा अपने सामने किसी भी साफ़ बर्तन में गुड़ या गुड़ से बनीं मिठाई जरूर रखे पाठ के बाद उसे स्वयं प्रसाद के रूप में लें घर में कोई संकट नहीं आता है विद्या बुद्धि बल बड़ता है समस्त दोष स्वत: ही समाप्त होने लगते है.जो प्रतिदिन श्री हनुमान चालीसा का पाठ आसन में बैठ कर करता है उसकी समस्त कामनाये भगवान राम जी के द्वारा शीघ्र पूरी होती है. श्री हनुमान चालीसा के एक सौ आठ १०८ पाठ  करने से  प्रतिष्ठा व सफलता प्राप्त होती है. चालीसा के पाठ से मन को शांति और कई समस्याओं के हल स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं।  कलयुग में हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है।श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान अपने भक्तों और धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों की हर कदम मदद करते हैं। सीता माता के दिए वरदान के प्रभाव से वे अमर हैं और किसी ना किसी रूप में अपने भक्तों के साथ रहते हैं।प्रतिदिन किसी भी समय श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से नवग्रह की शान्ति तो होती है और जटिल समस्याओं से छुटकारा भी मिल जाता है. धैर्य और विश्वास के साथ किया गया पाठ आपके जीवन में सफलता कि कुंजी बन सकता है






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Monday, 23 January 2012

दान-पुण्य का पर्व मकर सक्रांति


पं. मुकुन्द देव शुक्ला  


इलाहाबाद ज्योतिषाचार्य पं. मुकुन्द देव शुक्ला के अनुसार सम्पूर्ण भारत वर्ष में मकर सक्रांति का पर्व आदिकाल से ही सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों व वेदों में सूर्य को आत्मा माना गया है। निर्णय सिंधु के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा जब एक ही साथ माघ मास में मकर राशि पर आते हैं, तो उसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। मकर सक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। पं. मुकुन्द देव शुक्ला अनुसार सूर्योपासना का पर्व मकर सक्रांति इस बार 15 जनवरी को सम्पूर्ण देश भर में धूमधाम से मनाया जाएगा। इसी वर्ष सूर्य का दक्षिणायान से उत्तरायण मकर राशि में प्रवेश सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर मकर सक्रांति से सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलते हैं। सूर्य भूमध्य रोखा को पार कर उत्तर की ओर मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ना प्रारंभ कर देते हैं। इसी को सूर्य का उत्तरायण संक्रमण कहते हैं। उत्तरायण के 6 माह में सूर्य क्रमश: मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ, मिथुन इन 6 राशियों में भ्रमण करता है। प्राणी मात्र व वनस्पति को जीवन शक्ति सूर्य से ही प्राप्त होती है। सूर्य को प्रत्यक्ष भगवान माना गया है। ज्योतिष के मुताबिक एक सूर्य बारह माह में बारह नाम से जाना जाता है। बारह रूप धारण कर एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। मकर सक्रांति से दिन बड़े होने शुरू होते हैं।माना जाता है की मकर सक्रांति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से जाना जाता है | महाभारत काल में भीशमपितामा ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर सक्रांति का ही चयन किया था | मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरत के पीछे -पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी |
शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है |धरना है की इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है | इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है |